कर्ज
बढ़ता रहता है कर्ज दिन-प्रतिदिन,
अधिक ब्याज देता है अधिक दिन तक अधिक चिंता।
चुकाना चाहते हैं हम सब अपने कर्जों को, पर होता ये है जैसे समुन्दर में लहरों को संभालना नामुमकिन हो।
बैंकों और ऋण देने वालों से होती है कर्ज उठाने की उम्मीद, पर उनकी नजर में हम बस एक नंबर के उद्देश्य होते हैं न जीवन के मकसद न इरादे।
कर्ज से परेशान हम नहीं होते हैं एकल, बल्कि होते हैं वे जो उनसे लोभ कमाते हैं और हमेशा उनके प्रति असंवेदनशील होते हैं उनका मन तृष्णापूर्ण रहता है और वह उनके विचारों से अपना आत्मविश्वास खो देते हैं।
कर्ज से मुक्ति के लिए करनी पड़ती है संख्या गिनती, पर क्या हम वास्तव में उस स्थिति में नहीं हैं जहाँ हम कर्ज लेने के बजाय आत्मनिर्भरता और सार्थकता के रास्ते चुन सकते हैं।
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